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Travel story

दूनागिरी मंदिर और पांडुखोली: द्वाराहाट के आगे पहाड़ों की ओर

Dunagiri, Pandukholi and Bhatkot

admin · 2023-01-27

द्वाराहाट से लगभग 14 किलोमीटर आगे दूनागिरी देवी मंदिर की ओर सड़क जाती है। रास्ते के जंगल और ऊँचाई की ओर उठती पहाड़ियाँ यात्रा का हिस्सा बन जाते हैं। सड़क के पास वाहन रोकने और प्रसाद लेने के बाद मंदिर तक पैदल चढ़ाई शुरू होती है।

सीढ़ियों से मंदिर तक

मंदिर तक करीब एक किलोमीटर की चढ़ाई है। सीढ़ियों वाले मार्ग के कई हिस्सों में छत और विश्राम की जगह मिलती है। घंटियों की आवाज और दर्शन के लिए जाते लोगों के बीच धीरे-धीरे ऊपर पहुँचना अच्छा लगता है। बच्चों और बुजुर्गों के साथ चल रहे हों तो समय अधिक रखें।

परिसर में हनुमान, गणेश, भैरव और गोलू देवता से जुड़े स्थान भी हैं। मुख्य देवी की पूजा प्राकृतिक पिंडियों के रूप में होती है। अखंड ज्योति और वैष्णवी परंपरा मंदिर की धार्मिक पहचान का हिस्सा हैं। प्रसाद, नारियल और पूजा के संबंध में परिसर के निर्देश मानें। भंडारे की व्यवस्था और समय वहीं से पता करें।

दूनागिरी की मान्यताएँ

एक प्रचलित कथा इसे संजीवनी पर्वत का अंश गिरने से जोड़ती है। द्रोणाचार्य से संबंधित मान्यताएँ भी सुनने को मिलती हैं। ये कथाएँ क्षेत्र की आस्था और लोकस्मृति का हिस्सा हैं। मंदिर की यात्रा में स्थानीय लोगों से इन्हें सुनना इस स्थान को समझने का एक तरीका है।

कुकुछीना से पांडुखोली

दूनागिरी के आगे कुकुछीना की ओर सड़क बढ़ती है। यहाँ से पांडुखोली के लिए लगभग चार किलोमीटर का पैदल रास्ता है। बाँज और बुरांश के जंगल से गुजरता यह मार्ग मंदिर की सीढ़ियों से अलग अनुभव देता है। रास्ते की दशा, मौसम और लौटने के समय का ध्यान रखना जरूरी है।

पांडुखोली का नाम पांडवों से जुड़ी लोककथाओं में आता है। घास का खुला मैदान, भीमगद्दा के नाम से जाना जाने वाला स्थान और स्वामी बलवंत गिरि की स्मृतियों से जुड़ा आश्रम यहाँ के परिचित पड़ाव हैं। आश्रम में ठहरना हो तो व्यवस्था और नियम पहले पूछें।

बाबाजी की गुफा और भरतकोट

इस क्षेत्र की एक अन्य पहचान महावतार बाबाजी और लाहिड़ी महाशय से जुड़ी आध्यात्मिक परंपरा है। योगानंद की ‘योगी कथामृत’ पढ़ने वाले कई यात्री इसी संबंध के कारण यहाँ आते हैं। गुफा और आसपास के रास्तों के बारे में स्थानीय जानकारी लेकर चलें।

भरतकोट या भटकोट की यात्रा अधिक ऊँचाई और कठिन रास्ते वाला अलग अभियान है। इसे मंदिर दर्शन के बाद सहज छोटी सैर न समझें। स्थानीय मार्गदर्शक, भोजन-पानी और मौसम के अनुरूप तैयारी के साथ ही योजना बनाएँ। सामान्य दर्शन के लिए द्वाराहाट या रानीखेत में ठहरकर भी आया जा सकता है।

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